चुनाव आयोग में महाविस्फोट! 10 महीने में 14 बार आपस में ही भिड़े चुनाव आयुक्त, क्या खतरे में है लोकतंत्र?

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By - Sanvariya Times
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नमस्कार साथियों, स्वागत है आपका 'साँवरिया टाइम्स' में।
आज देश की राजनीति में एक ऐसा भूचाल आया है जिसने भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी रीढ़—"भारत निर्वाचन आयोग" (ECI) की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। देश के इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब चुनाव आयोग के भीतर की लड़ाई इस तरह सड़क पर आ गई हो।
क्या है पूरा मामला?
'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक खोजी रिपोर्ट के दस्तावेज़ी खुलासे ने पूरे देश को चौंका दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और उनके दो साथी चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पिछले 10 महीनों में इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने आयोग के भीतर लिए गए बड़े फैसलों और आदेशों पर 14 बार लिखित रूप से आपत्ति (Dissent) दर्ज कराई है।
आरोप क्या हैं?
  • वोटरों के नाम कटना: दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के दौरान लाखों वोटरों के नाम काटने और नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया के बारे में उन्हें अंधेरे में रखा गया।
  • बिना जानकारी के बड़े फैसले: कई फैसले पूरे चुनाव आयोग के नाम पर ले लिए गए, जबकि दोनों चुनाव आयुक्तों को इसकी भनक तक नहीं थी।
  • सॉफ्टवेयर पर सवाल: चुनाव आयोग के नए डिजिटल ऐप 'ECINet' को लेकर भी विपक्ष और आंतरिक स्तर पर सवाल उठ रहे हैं।
सियासी घमासान और आयोग की सफाई
इस खुलासे के बाद राहुल गांधी समेत पूरे विपक्ष ने इसे 'राजद्रोह' और 'वोटों की लूट' बताते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और सुप्रीम कोर्ट के दखल की मांग की है। वहीं, दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने आधिकारिक बयान जारी कर सफाई दी है कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में अलग-अलग विचार होना सामान्य बात है, लेकिन अंतिम फैसले सबकी सहमति (Unanimous) से ही हुए हैं।

आपका क्या विचार है?
एक निष्पक्ष नागरिक के तौर पर आपको क्या लगता है? क्या चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्था के भीतर ऐसा मतभेद होना लोकतंत्र की मजबूती को दर्शाता है या फिर यह दाल में कुछ काला होने का संकेत है?
नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय ज़रूर दें और इस पोस्ट को व्हाट्सएप पर शेयर करें!
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