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| बदहाल सड़क (प्रतीकात्मक तस्वीर - Representational Image) |
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चुनाव के समय नेताओं द्वारा किए जाने वाले वादों और हकीकत के इस बड़े अंतर को लेकर ककरहिया गांव के लोगों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का साफ़ तौर पर कहना है कि अब वे नेताओं के झूठे दिलासों और कागज़ी दावों के झांसे में आने वाले नहीं हैं।
गड्ढों में तब्दील हो चुकी है सड़क, आए दिन होते हैं हादसे
ककरहिया गांव की सबसे बड़ी समस्या यहाँ की मुख्य संपर्क सड़क है, जो पूरी तरह से बदहाल हो चुकी है। सड़क पर डामर का नामोनिशान मिट चुका है और उसकी जगह केवल बड़े-बड़े नुकीले पत्थर और गहरे गड्ढे बचे हैं। बारिश के दिनों में यह सड़क किसी जलमग्न दलदल जैसी दिखने लगती है। ग्रामीणों का आरोप है कि इस खस्ताहाल रास्ते के कारण आए दिन बाइक सवार और राहगीर गिरकर चोटिल होते रहते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी स्कूल जाने वाले छोटे बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाते समय होती है। एम्बुलेंस भी गांव के भीतर आने में कतराती है, जिसके कारण कभी भी बड़ी अनहोनी हो सकती है।
बिजली-पानी की किल्लत से ग्रामीण बेहाल
सड़क के अलावा ककरहिया गांव में पीने के पानी और बिजली की समस्या ने लोगों का जीना मुहाल कर रखा है। गांव के अधिकांश सरकारी हैंडपंप या तो खराब पड़े हैं या उनका पानी पीने लायक नहीं रह गया है। महिलाओं को पीने का पानी लाने के लिए हर रोज़ लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
वहीं अगर बिजली की बात करें, तो गांव में लगे ट्रांसफार्मर अक्सर फुके रहते हैं। कम वोल्टेज और घंटों की अघोषित बिजली कटौती के कारण बच्चों की पढ़ाई और खेती-किसानी का काम पूरी तरह से ठप हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने इन समस्याओं को लेकर कई बार स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को लिखित शिकायतें दीं, लेकिन अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है।
"बिजली, पानी, सड़क नहीं तो इस बार वोट नहीं"
गांव के चौपाल पर इकट्ठा हुए आक्रोशित ग्रामीणों ने अपनी बदहाली बयां करते हुए सीधे तौर पर चुनाव के बहिष्कार का ऐलान कर दिया है। ग्रामीणों ने एकजुट होकर नारा दिया है— “बिजली, पानी, सड़क नहीं तो इस बार वोट नहीं।”
गांव के बुजुर्गों और युवाओं का कहना है कि जब भी चुनाव आते हैं, तो बड़े-बड़े राजनीतिक दलों के नेता और प्रत्याशी हाथ जोड़कर गांव की गलियों में चक्कर काटने लगते हैं। उस समय बिजली, पानी और चमचमाती सड़कें बनवाने के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं और नेताजी की कुर्सी सुरक्षित हो जाती है, वे 5 साल के लिए गायब हो जाते हैं। इसके बाद गांव की समस्याएं जस की तस रह जाती हैं। इस बार ग्रामीणों ने मन बना लिया है कि जब तक ज़मीन पर काम शुरू नहीं होगा, तब तक किसी भी राजनीतिक दल के प्रत्याशी को गांव के भीतर पैर नहीं रखने दिया जाएगा।
अब जिम्मेदार कब लेंगे सुध?
ककरहिया गांव की यह बदहाल तस्वीर डिजिटल इंडिया के दौर में व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा है। ग्रामीण आज भी इस बुनियादी सवाल से जूझ रहे हैं कि आख़िर टैक्स भरने के बावजूद उन्हें नरकीय जीवन जीने पर क्यों मजबूर किया जा रहा है? अब देखना यह होगा कि इस ग्राउंड रिपोर्ट और ग्रामीणों के 'वोट बंदी' के खुले अल्टीमेटम के बाद ज़िला प्रशासन और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि नींद से कब जागते हैं और इन बेबस ग्रामीणों की सुध कब लेते हैं।

