नवसारी: क्रिप्टो करेंसी में ₹54 लाख की कथित धोखाधड़ी का मामला, कोर्ट ने गर्भवती महिला आरोपी को दी अग्रिम जमानत; एडवोकेट एस.एच. दुबे की दलीलों का रहा बड़ा असर

(Sanvariya Times)
✍️ By: Suresh Chandra
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नवसारी कोर्ट ने ₹54.20 लाख के क्रिप्टो करेंसी धोखाधड़ी मामले में आरोपी महिला सोनलबेन भक्ता की अग्रिम जमानत मंजूर की। वरिष्ठ वकील एस.एच. दुबे ने की पैरवी।

नवसारी। गुजरात के नवसारी जिला न्यायालय से एक बड़ी विधिक खबर सामने आ रही है। नवसारी के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (2nd Additional Sessions Judge) की अदालत ने क्रिप्टो करेंसी (Crypto Currency) में बेहतर रिटर्न का झांसा देकर करीब ₹54,20,000/- की कथित वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े एक संवेदनशील मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले की आरोपी महिला को मानवीय आधारों और विधिक मिसालों को देखते हुए अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) प्रदान कर दी है। कानूनी हलकों में इस फैसले को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें बचाव पक्ष के वकील की सटीक कानूनी रणनीतियों की बड़ी भूमिका रही।

क्या था पूरा मामला और किन धाराओं में दर्ज था केस?
अदालत के आधिकारिक आदेश के अनुसार, यह पूरा विवाद नवसारी टाउन पुलिस स्टेशन (Part-A) में दर्ज मुकदमा संख्या 11822019261341/2026 से जुड़ा हुआ है। मामले की आरोपी महिला सोनलबेन छगनलाल भक्ता (उम्र 34 वर्ष, निवासी निसर्ग विला, एरु, तहसील जलालपोर, जिला नवसारी) के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 420 (धोखाधड़ी) और 114 (अपराध के वक्त उकसाने वाले की उपस्थिति) के तहत केस पंजीकृत किया गया था।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि महिला ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर 'LFS Broking' और 'LPS Associates' नामक कंपनियों के जरिए क्रिप्टो करेंसी में निवेश कराकर भारी मुनाफे का लालच दिया और लाखों रुपये ऐंठ लिए।
कोर्ट रूम में दिखा एडवोकेट एस.एच. दुबे की दलीलों का दम
अदालत के भीतर जब इस जमानत याचिका पर सुनवाई शुरू हुई, तो कानूनी मोर्चे पर असली मुकाबला देखने को मिला। आरोपी महिला की ओर से पैरवी कर रहे नवसारी के प्रख्यात विधिक विशेषज्ञ और एडवोकेट एस.एच. दुबे (Ld. Adv. Mr. S.H. Dube) ने अदालत के समक्ष बेहद ठोस, तार्किक और मानवीय दृष्टिकोण से ओत-प्रोत दलीलें पेश कीं।
एडवोकेट एस.एच. दुबे ने माननीय न्यायालय का ध्यान इस बात की ओर आकर्षित किया कि:
  • महिला इस कथित कंपनी में केवल एक एजेंट के रूप में काम कर रही थी, वह किसी भी तरह से इसकी मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) नहीं है।
  • कथित निवेश की कोई भी राशि सीधे महिला के निजी बैंक खाते में ट्रांसफर नहीं की गई है और न ही मुख्य रकम उनके पास जमा है।
  • सबसे महत्वपूर्ण मानवीय पहलू को सामने रखते हुए एडवोकेट एस.एच. दुबे ने अदालत को अवगत कराया कि उनकी मुवक्किल वर्तमान में 3 महीने की गर्भवती (Pregnant) हैं। ऐसी स्थिति में जेल की सलाखों के पीछे जाना उनके और होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत गंभीर साबित हो सकता है।
बचाव पक्ष के वकील एस.एच. दुबे ने माननीय उच्च न्यायालय के प्रसिद्ध जजमेंट 'निकिताबेन बनाम गुजरात राज्य' और सर्वोच्च न्यायालय के 'सिद्धराम सतलिंगप्पा म्हात्रे' जैसे ऐतिहासिक फैसलों (Citations) की पूरी श्रृंखला अदालत के सामने रखी, जिससे आरोपी के अधिकार और विधिक राहत का पक्ष बेहद मजबूत हो गया।
सरकारी पक्ष का विरोध और माननीय न्यायाधीश का फैसला
दूसरी तरफ, राज्य सरकार की ओर से उपस्थित विद्वान सरकारी वकील (Ld. APP) मिस्टर बी.जी. गुप्ता ने पुलिस विभाग द्वारा दाखिल हलफनामे (Affidavit) का हवाला देते हुए जमानत याचिका का पुरजोर विरोध किया। सरकारी पक्ष का तर्क था कि यह एक बड़ा आर्थिक अपराध है और मामले की निष्पक्ष जांच व कस्टोडियल पूछताछ के लिए आरोपी का पुलिस हिरासत में होना आवश्यक है।
दोनों पक्षों की मैराथन और तीखी कानूनी बहसों को सुनने के बाद, द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पिंकी मरुतकुमार त्रिवेदी (Pinky Marutkumar Trivedi) ने मामले के सभी पहलुओं की बारीकी से समीक्षा की। कोर्ट ने माना कि चूंकि आरोपी एक महिला है, वर्तमान में गर्भवती है और जांच में पूरा सहयोग करने को तैयार है, इसलिए उसे सुरक्षा का विधिक अधिकार मिलना चाहिए। अदालत ने 30 सितंबर 2026 को अपना फैसला सुनाते हुए आरोपी सोनलबेन भक्ता की अग्रिम जमानत याचिका (Criminal Misc. Application No. 977/2026) को कुछ कड़ी शर्तों के साथ मंजूर (Allowed) कर लिया।
कोर्ट द्वारा लगाई गई मुख्य विधिक शर्तें
अदालत ने आरोपी को ₹10,000/- के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत राशि पर रिहा करने का आदेश जारी किया है, जिसके तहत उन्हें निम्नलिखित नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा:
  1. आरोपी को 07 अक्टूबर 2026 या उससे पहले संबंधित पुलिस स्टेशन के जांच अधिकारी (I.O.) के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर बेल बांड जमा करना होगा।
  2. वह जांच प्रक्रिया में पुलिस प्रशासन का पूरी तरह सहयोग करेंगी और जब भी पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा, उपस्थित रहेंगी।
  3. बिना सक्षम न्यायालय की पूर्व अनुमति के वे भारत देश की क्षेत्रीय सीमा से बाहर (विदेश) नहीं जा सकेंगी और अपना पासपोर्ट जांच अधिकारी के पास जमा कराएंगी।
  4. वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मामले से जुड़े किसी भी गवाह या साक्ष्य को प्रभावित या डराने-धमकाने का प्रयास बिल्कुल नहीं करेंगी।
विधिक जानकारों का मानना है कि इस पेचीदा और करोड़ों के कथित क्रिप्टो घोटाले से जुड़े मामले में अग्रिम जमानत हासिल करना एक बड़ी विधिक सफलता है, जो यह दर्शाती है कि कोर्ट रूम में सही विधिक नियमों और तथ्यों को अगर मजबूती से रखा जाए, तो न्याय की राह आसान हो जाती है।
कानूनी डिस्क्लेमर (Legal Disclaimer): यह समाचार रिपोर्ट पूरी तरह से नवसारी सत्र न्यायालय द्वारा दिनांक 30.09.2026 को जारी किए गए आधिकारिक अदालती निर्णय (Judgment - CRMA S/977/2026) के पन्नों पर उपलब्ध विधिक तथ्यों, दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा दी गई दलीलों और प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर तैयार की गई है। हमारा उद्देश्य किसी भी जांच को प्रभावित करना नहीं है। मामले की वास्तविक सच्चाई और अंतिम फैसला माननीय न्यायालय की पूर्ण न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होगा।

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