जेल में रची रामायण, बदला जीवन: राज्यपाल ने माफ की बुजुर्ग पोस्टमास्टर की उम्रकैद

(Sanvariya Times)
✍️ By: Suresh Chandra
0

 

• elderly prisoner writing ramayan



कन्नौज / छिबरामऊ:
मानवीय संवेदना, न्याय के सिद्धांत और रचनात्मक सुधार की एक ऐसी मिसाल उत्तर प्रदेश से सामने आई है, जिसने न्यायशास्त्र और समाजशास्त्र के जानकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने जेल में बंद एक सेवानिवृत्त पोस्टमास्टर की उम्रकैद की सजा को उनके उत्कृष्ट और अनुकरणीय आचरण के आधार पर पूरी तरह माफ कर दिया है। यह मामला केवल एक सजा माफी का कानूनी दस्तावेज भर नहीं है, बल्कि सलाखों के पीछे बीते आठ वर्षों के दौरान एक कैदी के भीतर उपजे उस आध्यात्मिक और साहित्यिक बदलाव की कहानी है, जिसने जेल की कालकोठरी को एक पावन तपोभूमि में बदल दिया।
सजा माफी का यह आदेश छिबरामऊ के कसावा गांव निवासी नक्षत्र सहाय दुबे से जुड़ा हुआ है। कभी समाज में एक सम्मानित सरकारी सेवक के रूप में पहचान रखने वाले नक्षत्र सहाय दुबे ने अपने जीवन के आठ से अधिक वर्ष जेल की दीवारों के बीच बिताए। लेकिन इस अंधियारे सफर में उन्होंने अवसाद को खुद पर हावी नहीं होने दिया, बल्कि सनातन संस्कृति के महाग्रंथ 'रामायण' के विभिन्न प्रसंगों को अपने शब्दों में पिरोकर सात अद्वितीय खंड काव्यों की रचना कर डाली। उनके इसी आध्यात्मिक रूपांतरण और जेल नियमों के प्रति पूर्ण समर्पण को देखते हुए राजभवन द्वारा यह संवेदनशील निर्णय लिया गया है।
राजनीति शास्त्र के विद्वान से पोस्टमास्टर बनने का सफर
नक्षत्र सहाय दुबे का अतीत अपराध की दुनिया से बिल्कुल विपरीत रहा है। वह अपने क्षेत्र के गिने-चुने उच्च शिक्षित युवाओं में से एक थे। उन्होंने साल 1972 में राजनीति शास्त्र (Political Science) जैसे गंभीर विषय से स्नातकोत्तर (एमए) की उपाधि प्राप्त की थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने डाक विभाग की परीक्षा उत्तीर्ण की और पोस्टमास्टर के पद पर नियुक्त हुए। अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने विभाग में बेहद ईमानदारी और निष्ठा से कार्य किया, जिसके कारण ग्रामीण इलाकों में उनका काफी सम्मान था। सेवानिवृत्ति के बाद उनका जीवन शांति से बीत रहा था, लेकिन कानूनी विवाद के चलते उन्हें जीवन के उत्तरार्ध में जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा।
सलाखों के पीछे साहित्यिक साधना: रचे रामायण के 7 खंड काव्य
जेल जाने के बाद नक्षत्र सहाय दुबे ने टूटने या बिखरने के बजाय अपनी शिक्षा और वैचारिक ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने का संकल्प लिया। उन्होंने जेल के भीतर ही कागज और कलम को अपना साथी बनाया और रामायण के गहन प्रसंगों पर लेखन शुरू किया। उन्होंने जेल प्रशासन के सहयोग से धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन किया और प्रभु श्रीराम के जीवन के उन चरित्रों पर ध्यान केंद्रित किया, जो त्याग, समर्पण और न्याय की प्रतिमूर्ति हैं।
आठ वर्षों के कड़े कारावास के दौरान उन्होंने एक या दो नहीं, बल्कि पूरे सात खंड काव्यों की रचना कर डाली। उनके द्वारा रचित प्रमुख काव्यों में शामिल हैं:
  • कैकेयी चरित्र: जिसमें महारानी कैकेयी के अंतर्द्वंद्व और उनके त्याग के अनछुए पहलुओं को उकेरा गया है।
  • भरत चरित्र: भाई के प्रति अगाध प्रेम और सत्ता के त्याग की अनुपम व्याख्या।
  • सीता वनवास: माता सीता के धैर्य, कष्ट और उनके नारीत्व की गरिमा का सजीव चित्रण।
  • विभीषण शरणागत: अधर्म के रास्ते को छोड़कर धर्म की शरण में आने की मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति।
  • लंका विजय: सत्य की असत्य पर जीत का एक ऊर्जावान और काव्यात्मक विवरण।
  • दशम स्कंद: भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और आध्यात्मिक दर्शन का रसपूर्ण संकलन।
जेल के भीतर किसी कैदी द्वारा इतनी बड़ी साहित्यिक उपलब्धि हासिल करना देश के जेल सुधार इतिहास में एक दुर्लभ घटना मानी जा रही है।
पत्नी का अथक संघर्ष और राजभवन की सहृदयता
जब नक्षत्र सहाय दुबे जेल में अपनी लेखनी के माध्यम से अपनी आत्मा को शुद्ध कर रहे थे, बाहर उनकी वृद्ध एवं सेवानिवृत्त शिक्षिका पत्नी पुष्पा देवी न्याय और मानवीय आधार पर उनकी रिहाई के लिए कानूनी व प्रशासनिक दरवाजे खटखटा रही थीं। 31 मार्च 2023 को पुष्पा देवी ने सीधे उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक भावुक दया याचिका भेजी।
इस याचिका में उन्होंने अपने पति की उम्र, पूर्व में किए गए सामाजिक कार्य, उनके उच्च शैक्षणिक स्तर और जेल के भीतर उनके द्वारा की जा रही साहित्यिक सेवा का विस्तार से उल्लेख किया। उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग और राजभवन ने इस याचिका को बेहद गंभीरता से लिया। जेल प्रशासन से नक्षत्र सहाय दुबे के आचरण की विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई। 22 सितंबर 2026 को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने सभी कानूनी पहलुओं, कैदी की ढलती उम्र और उनके अनुकरणीय उत्तम आचरण की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए संविधान प्रदत्त शक्तियों का उपयोग किया और उनकी उम्रकैद की सजा को आधिकारिक रूप से माफ कर दिया।
जेल अधीक्षक की आधिकारिक पुष्टि
इस ऐतिहासिक सजा माफी के संबंध में जेल अधीक्षक रवींद्र कुमार ने मीडिया को विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि नक्षत्र सहाय दुबे का पूरा आपराधिक इतिहास खंगालने पर यह बात सामने आई कि उनके खिलाफ जीवन में सिर्फ यही एक मामला दर्ज था, जो एक चुनावी विवाद का परिणाम था। जेल में रहने के दौरान उन्होंने कभी भी किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया।
जेल अधीक्षक के अनुसार, "नक्षत्र सहाय दुबे का आचरण जेल के अन्य बंदियों के लिए भी प्रेरणास्रोत बना रहा। उन्होंने अपना अधिकांश समय पूजा-पाठ, ध्यान और काव्यों की रचना में बिताया। उनके इसी असाधारण बदलाव और शांतिप्रिय व्यवहार के कारण कारागार प्रशासन ने उनकी दया याचिका की पुरजोर सिफारिश की थी, जिसे माननीय राज्यपाल महोदय ने स्वीकार कर लिया।" प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान में वह माननीय उच्च न्यायालय (High Court) के पूर्व आदेशानुसार अंतरिम जमानत पर जेल से बाहर हैं और इस फैसले के बाद उनकी पूर्ण रिहाई की प्रक्रिया को कानूनी रूप से पूरा किया जा रहा है।
जज भी रह गए हैरान, सरकारी खर्च पर प्रकाशन का आश्वासन
नक्षत्र सहाय दुबे की प्रतिभा केवल जेल के कैदियों या प्रहरियों तक ही सीमित नहीं रही। जेलों के नियमित निरीक्षण के दौरान तत्कालीन जनपद न्यायाधीश (Judge) सीपी चौहान ने जब इस वृद्ध कैदी से मुलाकात की, तो वह उनकी विद्वता देखकर दंग रह गए। जेल अधिकारियों ने न्यायाधीश के समक्ष दुबे द्वारा हस्तलिखित सातों खंड काव्यों की मूल प्रतियां प्रस्तुत कीं।
न्यायाधीश सीपी चौहान ने काव्यों की कुछ पंक्तियों और छंदों को पढ़ा, तो वह उनके साहित्यिक स्तर, व्याकरण की शुद्धता और प्रवाह से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने जेल के भीतर ऐसी अद्भुत रचना की मुक्त कंठ से सराहना की। सूत्रों के अनुसार, जज ने मौके पर ही मौजूद अधिकारियों को निर्देश देते हुए आश्वासन दिया था कि इन उच्च स्तरीय खंड काव्यों को समाज के सामने लाया जाना चाहिए और इनके प्रकाशन के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किए जाएंगे, ताकि अन्य लोग भी सलाखों के पीछे छिपी इस सकारात्मकता से प्रेरणा ले सकें।
निष्कर्ष: जेल सुधारों की दिशा में एक नया मील का पत्थर
नक्षत्र सहाय दुबे का यह मामला भारतीय न्याय प्रणाली और जेल सुधारों (Prison Reforms) के संदर्भ में एक नजीर है। यह साबित करता है कि जेल केवल दंड देने का स्थान नहीं है, बल्कि यदि सही मार्गदर्शन और मानसिक दृढ़ता हो, तो यह सुधार गृह और रचनात्मकता का केंद्र भी बन सकता है। एक वृद्ध पोस्टमास्टर द्वारा जीवन के अंतिम पड़ाव में कानून का सामना करते हुए खुद को पूरी तरह बदल लेना और साहित्य की अमूल्य धरोहर समाज को सौंपना यह संदेश देता है कि सुधार की गुंजाइश हर इंसान के भीतर हमेशा जीवित रहती है। राज्यपाल के इस फैसले की चारों ओर सराहना हो रही है और इसे न्याय के साथ-साथ करुणा की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।

Post a Comment

0 Comments

Post a Comment (0)
3/related/default